किसी का गम हूँ तो खुशी भी हूँ मैं

किसी का गम हूँ तो खुशी भी हूँ मैं

जमाने को मुस्करा के तो दिखा रहा हूँ मैं

ख्वाहिशें कुछ भी रही हो मेरी…. बस !

दुनिया के दस्तूर भी तो निभा रहा हूँ मैं

– वीरेन्द्र

Kisi ka gam hun tau khusi bhi hun mai
Jamane ko muskara ke tau dikha raha hun mai
Khwahinse kuch bhi rahi ho meri…. bas !
Duniya ke dastur bhi tau nibha raha hun mai
– VIRENDRA

यह भी कर के देख लिया

यह भी कर के देख लिया, कि अब तुझे याद न करूँ
कमबख्त ….! एक तेरे सिवा ही, सब कुछ भूल गया
– वीरेन्द्र

Ye bhi kar ke dekh liya, ki ab tujhe yaad na karnu
Kambakht…..! ek tere siva hi, sab kuch bhul gaya
– VIRENDRA

 

कुछ तुम कहो ऐसा

कुछ तुम कहो ऐसा,
कि दिल में उतर जाए

ओर वो शब्द हो ऐसे,
जो रोम – रोम में समा जाए

जब भी, कहीं भी, कभी भी,
मिले नज़रे हमारी……

फिर नजरें तुम्हारी,
बिन बोले ही समझ जाए

– वीरेन्द्र

Kuch tum kaho esa
Ki dil mai outar jaye,

Aur wo sabd ho ese
Jo rom – rom mai sama jaye

Jab bhi, kanhi bhi, kabhi bhi,
Mile nazarne hamari

Phir nazrne tumhari,
Bin bole hi samjh jaye

– Virendra

जो जुबां पर नहीं है

जो जुबां पर नहीं है
उन बातों को
तुम ही समझ लो

कोई झिझक – सी है
मेरी फितरत में
तुम ही समझ लो

इश्क – ए – जुनून भी है
और मुहब्बत में
अदब भी देख लो

मेरी जो चाहत है
इसका इम्तिहान न लो
तुम ही समझ लो

किस तरहा हूँ
अब तेरे बिन में
जरा – सा आकर देख लो

बे – पनाह भरा हूँ
मुझे महसूस करो
तुम ही समझ लो

– वीरेन्द्र

नजरें इनायत कर , इश्क की हवा देदो

नजरें इनायत कर , इश्क की हवा देदो
दिल में लगी है आग , जरा सी हवा देदो

कई दिनों से छुपा है , बदली में कोई चांद
कभी छत पर आकर , जरा सी हवा देदो

इश्क का चढ़ाए बैठा हूँ , कैसा ये बुखार
घुट – घुट के जी रहा हूँ , जरा सी हवा देदो

नरम पड़ गया है फिर , चर्चाओं का बाजार
फिर से आकर ही सही , जरा सी हवा देदो

कब से जलाये बैठा हूँ , उम्मीदों के ये चिराग
बुझाने के लिये ही सही , जरा सी हवा देदो

चन्द मुलाक़ातों ने , क्या किया हाल ‘वीरेन्दर’
सूखती नहीं नम आंखें , जरा सी हवा देदो

– वीरेन्द्र

क्या…..! इतना काफी नहीं

क्या…..!

इतना काफी नहीं
हमारी मुहब्बत के
फसाने के लिए…

मैंने इजहार किया
और…..
तूने इकरार किया

अब चाहतें हमारी
दूरियों की भी
मोहताज़ नही…

तूने याद किया
और…..
मैंने अहसास किया

कोई गिले – शिक़वे
और जिन्दगी से
शिकायत भी नही…

क्यों कि…..

तूने भी प्यार किया
और…..
मैंने भी प्यार किया

– वीरेंद्र

सीने से लग

सीने से लग
और धड़कनों की
जुबां सुन

मेरी न सही
लेकिन दिल की
जुबां सुन

मेरी मुस्कानों को
अब तेरी ही
जरूरत है

नजरों से नजरें
मिलाकर आंखों की
जुबां सुन

मेरी सांसों को
अब तेरी ही
जरूरत है

सांसों से सांसें
मिलाकर जिन्दगी की
जुबां सुन

– वीरेन्द्र

कुछ लम्हे तेरे संग

कुछ लम्हे तेरे संग
इस तरहा जी लिया

जिन्दगी की जरूरत बन गये हो

सांसों को सांसों ने
इस तरहा छू लिया

धड़कनों की जरूरत बन गये हो

जो दरमियाँ है दूरियां
इस तरहा मिटा दो

ख्वाब को तोड़ कर आ भी जाओ

तुम को दिल ने
इस तरहा चाह लिया

अब मेरी जरूरत बन गये हो

– वीरेन्द्र

नयनों की आस हो

नयनों की आस हो
होठों की प्यास हो
सहरा बने जीवन में
उम्मीदों.. की बूँद हो

ख्वाब ही सही मगर
जिन्दगी की हकीकत हो
एक पहेली ही सही
मगर सुलझी – सी हो

खयालों से भी ओझल
जब – जब भी हुए हो
वीरान-सी लगे जिन्दगी
तन्हा – से छोड़ गए हो

दुआओं में भी ढूंढा
मगर मिलते कहाँ हो
आसमां के परे – से
तुम खुदा से लगते हो

– वीरेन्द्र

बन्द कर आँखों को

बन्द कर आँखों को
जब चाहे बुला लेता हूँ

दिल की ख्वाहिशों को
थोड़ा यूँही भूना लेता हूँ

गुदगुदाता हूँ, तो कभी
गुनगुना लेता हूँ, अक्सर

तेरी गैर मौजूदगी को
बस यूँही भुला लेता हूँ

– वीरेन्द्र