कब से खामोश थी


कब से ……….. खामोश थी …… जुबां
सिर्फ … आंखें ही …… बोला करती थी
हम ……. समझ कर भी …… न समझें
हमने भी …. कोई ….खता तो न की थी
गर है इतनी ही …………. मुहोब्बत तो
एक बार ही सही ……….. इजहार कर
हम पर न सही ……… मुकम्मल किया
उस खुदा पर तो ………… ऐतबार कर
हमने भी बहुत ………… सजदे किए हैं
…………………………आंखें बन्द कर
दिल में ही ………………… तो रहते हो
………………………… खुदा बन कर
दुआओं में मेरी ….. कोई कमी भी न थी
यकीन मेरा भी ……………. वाजिब था
होना ही था …. एक दिन उनको हमारा
यह खुदा का ………………. करम था
– वीरेन्द्र

क्यों करते हो मोहब्बत मुझ से


क्यों करते हो मोहब्बत मुझ से
क्यों खेलते हो मेरे जज्बातों से
क्या बिगाड़ा है मैने तुम्हारा ……
क्यों नहीं चले जाते हो दूर मुझ से
– वीरेन्द्र
Quno karte ho mohabbat mujha se
Quno khelate ho mere jajbnatno se
Kya bigada hai maine tumhara ……
Quno nahi chale jaate ho dur mujha se
– Virendra

कैसी है यह आजादी


कैसी है
ये आजादी
कैसी है
ये सत्ता

जनता का ही
पैसा
जनता में
नहीं बंटता

कोई
जलाये
दीप
दिवाली के

किसी का
बच्चा तो
भूख से
मरता

°°° वीरेन्द्र °°°

☆☆☆ ○•○ ☆☆☆

Kesi hai
Ye aajadi
Kesi hai
Ye satta

Janta ka hi
Pesaa
Janta mai
Nahi bantata

Koyi
Jalaye
Deep
Diwali ke

Kisi ka
Bachha tau
Bhuk se
Marata

••• VIRENDRA •••

जहाँ जरूरत है


जहाँ जरूरत है
दवात और कलम की
वहाँ बारूद मत बांटो ।

जहाँ जरूरत है
अमन और चैन की
वहाँ नफरत मत बाँटो ।

बन्द कर दो
उन धर्म की किताबों को
जो बांटना सिखाती है ।

बांटना ही है
तो सिर्फ प्यार बांटो
या फिर कुछ भी मत बांटो ।

– वीरेन्द्र

दोस्ती कहो या मित्रता


दोस्ती कहो या मित्रता
एक ही बात है
प्यार और दोस्ती में
फर्क है
प्यार में अधिकारों का
इस्तेमाल होता है
और दोस्ती में
त्याग होता है

इसिलिए………….
दोस्ती और प्यार
दोनों का साथ होना आवश्यक है
जो लोग प्यार और दोस्ती में
फर्क करके चलते हैं
वो अक्सर विचलित होते हैं

सुदामा को ही देख लो

हाँ हुई तो……..
प्यार से सब ले आए
ना होती तो……..
दोस्त की मजबूरी समझकर
लौट आना था

यही सच्चे रिश्तों की पहचान है ।

– वीरेन्द्र

तेरी बातों में


तेरी बातों में
तेरे अलफाजों में
तेरी कहानी में
तेरे किस्सों में

बस मुझे ही पाता हूँ

तेरी कविताओं में
तेरे गीतों में
तेरी गजलों में
तेरे छन्दो में

बस मुझे ही पाता हूँ

तू ढूँढ रही है
मुझे बाहर में
तू पूछ रही है
मुझे दुनिया में

मैं तो तुझ में ही हूँ

तेरी चीखों में
तेरे दर्द में
तेरी आह में
तेरे अाँसुओं में

बस मुझे ही पाता हूँ

तू ढूँढ मुझे
अब अन्दर में
तू पूछ मुझे अब
भीतर मन में

मैं तो तुझ में ही हूँ

तेरी आँखों में
तेरे दिल में
तेरी रूह में
तेरे जिस्म में

बस मुझे ही पाता हूँ

– वीरेन्द्र

वो पास थी मेरे


वो पास
थी मेरे
और मैं था …
उसमें खोया

जाने कब
चली गई !

जब आँख
खुली मेरी
कुछ बेजान …
फुलों में

महक-सी
उसकी पाई !

ऐसा ही
क्यों होता है
अकसर …
मेरे साथ

क्यों मौन
हो जाता हूँ !

इतना पास
होकर भी
अकसर …
उसे ही

इतना दूर
क्यूं पाता हूंँ !

– वीरेन्द्र

Wo paas
Thi mere
Aur mai tha…
Ousme khoya

Jane kab
Chali gayi

Jab aankh
Khuli meri
Kuch bejaan…
Phoolno mai

Mahak-si
Ouski paayi

Esha hi
Qun hota hai
Akshay…
Mere saath

Qun maun
Ho jaata hun

Itana paas
Hokar bhi
Akshar…
Ouse hi

Itana door
Qun paata hun

– Virendra

तुम ही हो प्रेरणा

तुम ही हो प्रेरणा 
तुम शब्दों की सरिता
तुम ही हो वो रचिता
मेरे उन्मुक्त भावों की संचिता
हाँ………..  हाँ……….. 
तुम से ही है कविता
 
– वीरेन्द्र
 
Tum Hi Ho Prerana 
Tum Sabdno Ki Sarita
Tum Hi Ho Wo Rachita
Mere Ounmukta Bhanwo Ki Sanchita
Hna……….  Hna………. 
Tum Se Hi Hai Kavita 
 
– VIRENDRA

उन जख्मों का इलाज तो है,

उन जख्मों का इलाज तो है,
जो चोट लगने से हुए है !
उनका क्या करें…

जो बगैर चोट के मिलें है! 

वक्त के साथ गहरे जख्म भी, 
भर ही जाते हैं !
उनका क्या करें…

जो दिखते भी नहीं 
और निशान छोड़ जाते हैं !

– वीरेन्द्र 

OUN JAKHMNO KA ILAZ TO HAI
JO CHHOT LAGNE SE HUVE HAI
OUNKA KYA KARNE……

JO BAGER CHHOT KE MILE HAIN

WHAKT KE SHAATH GAHRE JAKHM BHI,
BHAR HI JAATE HAIN
OUNKA KYA KARNE……

JO DIKHTE BHI NAHI
AUR NISHAN CHHOD JAATE HAIN

– VIRENDRA